Subhadra Kumari Chauhan Biography I India’s First women satyagrahi

Subhadra Kumari Chauhan Biography

Subhadra Kumari Chauhan was born on 16 August 1904 in Nihalpur near Allahabad, Uttar Pradesh.

As a member of the Indian nationalist movement Subhadra Kumari Chauhan used her poems to inspire others to fight for the sovereignty of the country.

Her father Ramnath Singh was a landowner but was also conscious about studies.

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She was very keen on poetry. Subhadra started reciting poetry from her childhood.

She is also known for sitting in a carriage and writing on the way to school.

Her first poem was published at the age of just nine which she wrote on a Neem tree.

Her nationalist poem “Jhansi Ki Rani- ख़ूब लड़ी मर्दानी वह तो झांसी वाली रानी थी” is considered one of the most widely read poems in Hindi literature.

Google today penned a doodle to honor the life and achievements of Subhadra Kumari Chauhan, a writer and freedom fighter, whose works enjoyed a high reputation during the period when male dominated literature. 

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On the occasion of the 117th birthday of the Indian activist and writer, the Google Doodle shows Subhadra Kumari Chauhan sitting on a saree holding a pencil and paper.

Doodle was created by New Zealand guest artist Prabhoy Malla.

As a member of the Indian nationalist movement, she used her poems to inspire others to fight for national sovereignty.

Subhadra had four sisters and two brothers. She came forward in the freedom movement and went to jail several times.

Subhadra kumari Chauhan married Laxman Singh. Laxman Singh was a playwright and he always supported his wife in pursuing her talent. Together they worked for the Congress.

Subhadra used to go among the women and inspire them to adopt Swadeshi and give up all narrow-mindedness.

Taking care of her living, she used to serve literature and society.

Born on August 16, 1904, Subhadrakumari Chauhan died on February 15, 1948 at the age of 44.

She used to say about her death that “I do not have the idea of leaving the earth even after I die. I want to have a samadhi around which a fair is held, children keep playing, women keep singing and celebrating.” 

Poems of Subhadra Kumari Chauhan

यह कदम्ब का पेड़

यह कदंब का पेड़ अगर माँ होता यमुना तीरे

मैं भी उस पर बैठ कन्हैया बनता धीरे-धीरे

ले देतीं यदि मुझे बांसुरी तुम दो पैसे वाली

किसी तरह नीची हो जाती यह कदंब की डाली

तुम्हें नहीं कुछ कहता पर मैं चुपके-चुपके आता

उस नीची डाली से अम्मा ऊँचे पर चढ़ जाता

वहीं बैठ फिर बड़े मजे से मैं बांसुरी बजाता

अम्मा-अम्मा कह वंशी के स्वर में तुम्हे बुलाता

बहुत बुलाने पर भी माँ जब नहीं उतर कर आता

माँ, तब माँ का हृदय तुम्हारा बहुत विकल हो जाता

तुम आँचल फैला कर अम्मां वहीं पेड़ के नीचे

ईश्वर से कुछ विनती करतीं बैठी आँखें मीचे

तुम्हें ध्यान में लगी देख मैं धीरे-धीरे आता

और तुम्हारे फैले आँचल के नीचे छिप जाता

तुम घबरा कर आँख खोलतीं, पर माँ खुश हो जाती

जब अपने मुन्ना राजा को गोदी में

प्रथम दर्शन

प्रथम दर्शन

प्रथम जब उनके दर्शन हुए

हठीली आंखें अड़ ही गईं

बिना परिचय के एकाएक

हृदय में उलझन पड़ ही गई

मूँदने पर भी दोनों नेत्र

खड़े दिखते सम्मुख साकार

पुतलियों में उनकी छवि श्याम

मोहिनी, जीवित जड़ ही गई

भूल जाने को उनकी याद

किए कितने ही तो उपचार

किंतु उनकी वह मंजुल-मूर्ति

छाप-सी दिल पर पड़ ही गई

साक़ी

साक़ी

अरे! ढाल दे, पी लेने दे! दिल भरकर प्यारे साक़ी

साध न रह जाये कुछ इस छोटे से जीवन की बाक़ी

ऐसी गहरी पिला कि जिससे रंग नया ही छा जावे

अपना और पराया भूलं; तू ही एक नजऱ आवे

ढाल-ढालकर पिला कि जिससे मतवाला होवे संसार

साको! इसी नशे में कर लेंगे भारत-मां का उद्धार

ठुकरा दो या प्यार करो

देव! तुम्हारे कई उपासक कई ढंग से आते हैं

सेवा में बहुमूल्य भेंट वे कई रंग की लाते हैं

धूमधाम से साज-बाज से वे मंदिर में आते हैं

मुक्तामणि बहुमुल्य वस्तुऐं लाकर तुम्हें चढ़ाते हैं

मैं ही हूँ गरीबिनी ऐसी जो कुछ साथ नहीं लायी

फिर भी साहस कर मंदिर में पूजा करने चली आयी

धूप-दीप-नैवेद्य नहीं है झांकी का श्रृंगार नहीं

हाय! गले में पहनाने को फूलों का भी हार नहीं

कैसे करूँ कीर्तन, मेरे स्वर में है माधुर्य नहीं

मन का भाव प्रकट करने को वाणी में चातुर्य नहीं

नहीं दान है, नहीं दक्षिणा खाली हाथ चली आयी

पूजा की विधि नहीं जानती, फिर भी नाथ चली आयी

पूजा और पुजापा प्रभुवर इसी पुजारिन को समझो

दान-दक्षिणा और निछावर इसी भिखारिन को समझो

मैं उनमत्त प्रेम की प्यासी हृदय दिखाने आयी हूँ

जो कुछ है, वह यही पास है, इसे चढ़ाने आयी हूँ

चरणों पर अर्पित है, इसको चाहो तो स्वीकार करो

यह तो वस्तु तुम्हारी ही है ठुकरा दो या प्यार करो

To commemorate her exemplary work, a ship of the Indian Coast Guard was named after her .

The Madhya Pradesh government erected a statue of Subhadra Kumari Chauhan in front of the Jabalpur Municipal Corporation Office.

Poem Source: HTTPS://WWW.AMARUJALA.COM/KAVYA/HINDI-POETESS-SUBHADRA-KUMARI-CHAUHAN-LIFE-POETRY?PAGE=9

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