Singhbhum: Top 20 facts about Singh dynasty

Hello AspirantsJharkhand GS की इस Article में हम आपको Singhbhum: Top 20 facts about Singh dynasty के बारे में विस्तार से बताएँगे।

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Singhbhum वंश की पृष्ठ्भूमि पढ़े – History of Jharkhand – Regional Dynasties 

Singhbhum: अकबर काल (1556-1605)

➤ सिंहवंशी शासक – रणजीत सिंह 

अन्य क्षेत्रीय राजवंश के साथ ही Singhbhum का मुगलों से प्रथम सम्पर्क अकबर के समय में स्थापित हुआ। 

उड़ीसा अभियान के दौरान राजा मान सिंह 1592 ई. में Singhbhum से गुजरा। पोरहाट के सिंहवंशी राजा रणजीत सिंह ने मुग़लों से संधि कर सालाना कर देना स्वीकार कर लिया।

बाद में रणजीत सिंह को राजा मान सिंह के अंगरक्षक दल में शामिल कर लिया गया।

Singhbhum: जहांगीर-शाहजहाँ-औरंज़ेब काल

➥ इस पुरे काल खंड में Singhbhum राज्य मुग़लों के अधीन रहा। 

पर औरंज़ेब के शासन काल में पोरहट स्वतंत्र था और मुग़लों का इस क्षेत्र पर कोई दखल नहीं था।

Singhbhum: उत्तर मुग़ल काल

➤ सिंहवंशी शासक – अर्जुन सिंह II 

अर्जुन सिंह II के पिता पुरुषोत्तम सिंह की मृत्यु हो जाने के कारण उसका लालन-पालन चाचा विक्रम सिंह ने किया।

अर्जुन सिंह II राजा बनने के बाद अपने चाचा विक्रम सिंह को एक जागीर दान में दिया जो ‘सिंहभूम पीर’ के नाम से जाना जाता था।

इस दान में मिली जागीर का विक्रम सिंह ने विस्तार कर इसकी राजधानी  सरायकेला को बनाया। 

यहीं से सरायकेला राज्य की स्थापना हुई।

इधर पोरहाट के सिंहवंशी राजा अर्जुन सिंह II की मृत्यु हो जाने के बाद जगन्नाथ सिंह IV पोरहाट का राजा बना। 

जगन्नाथ सिंह IV के समय पोरहाट राज्य में कोल और हो जनजातियों ने राज्य में उपद्रव मचा रखा था। 

इनका उपद्रव के कारण पोरहाट नरेश को छोटानागपुर खास के नागवंशी राजा दर्पनाथ शाह की सहायता लेनी पड़ी। 

फिर भी इनका उपद्रव को समाप्त नहीं किया जा सका। विवश हो कर जगन्नाथ सिंह IV को अंग्रेजों से सहायता मांगनी पड़ी। 

और इस तरह अंग्रेजो का Singhbhum क्षेत्र में सवप्रथम आगमन 1767 ई. में हुई।

Singhbhum: अंग्रेज काल (1767 -1837 ई.)

➤ अंग्रेज काल में Singhbhum क्षेत्र में तीन प्रमुख राज्य थे –

1. ढालभूम    2. पोरहाट    3. हो-देशम/ कोल्हान

 ढालभूम 

ढालभूम राज्य पर कब्ज़ा करने की जिम्मेवारी अंग्रेजो ने कैप्टन फरग्युसन को सौपा। 
कैप्टन फरग्युसन ने सबसे पहले झाड़ग्राम के राजा को हराया। 

इस पराजय से अन्य क्षेत्र के जमींदार और राजा भयभीत हो उठे और कम्पनी की अधीनता स्वीकार कर ली।

फिर कैप्टन फरग्युसन ढालभूम की ओर बड़ा और ढालभूम के राजा को आत्मसमर्पण करने को कहा पर राजा ने मना कर दिया।

दोनों सेनाओं के मध्य जामबनी (घाटशिला) में युद्ध शुरू हुआ पर राजा को हार का मुख देखना पड़ा।

राजा ने घाटशिला के अपने महल में अपनी सम्पति सहित आग लगा ली। बाद में अंग्रेजों ने राजा को बंदी बना लिया।

अंग्रेजों ने ढालभूम राजा के भतीजे जग्गनाथ ढाल को ढालभूम का राजा बनाया और सालाना कर तय किया गया।

➥ ढालभूम का विद्रोह (1768 -1777 ई.) –

1768 में जग्गनाथ ढाल ने अंग्रेजों के खिलाफ विद्रोह कर दिया। इस विद्रोह को दबाने और जग्गनाथ ढाल को पकड़ने के लिए लेफ्टिनेंट रुक और कैप्टेन चार्ल्स मॉर्गन ने नाकाम प्रयास किया।

इसके बाद जग्गनाथ ढाल के भाई नीमू ढाल को राजा बना दिया गया। 

जग्गनाथ ढाल ने 10 वर्षो तक संघर्ष किया और अंत में अंग्रजो ने जग्गनाथ ढाल को ही राजा स्वीकार कर लिया। 

पोरहाट 

➤ पोरहाट राज्य पर अधिकार करने के 2 प्रमुख कारण थे –

1. नमक के व्यापारी जो ओडिशा (मराठों के अधीन) से नमक का कारोबार करते थे उन पर रोक लगा कर अपने राजस्व नुक्सान पर रोक लगाना,

कंपनी ने इस पर रोक लगाने के लिए कैप्टेन फोरबिस ने पोरहाट राजा को एक समझौता किया।

2. सम्बलपुर – बंगाल और कटक- बनारस के बीच एक छोटे और सुरक्षित मार्ग प्रसस्त करना ।

Third Anglo – Maratha war 1818 में अंग्रेजों ने मराठों को पराजित कर दिया, और इसके साथ ही अंग्रेज भारत में सर्व शक्तिमान बन कर उभरे। 

इस कारण तत्कालीन पोरहाट राजा घनश्याम सिंह ने अंग्रेजों से संधि कर ली।

➤ इस संधि के तीन प्रमुख कारण थे –

1. पोरहाट राजा सरायकेला-खरसवाँ पर अपनी संप्रभुता स्थापित करना चाहता था। 

2. सरायकेला के शासक अभिराम सिंह से अपनी कुल देवी पौरी देवी की मूर्ति हासिल करना चाहता था।

3. “हो” जनजाति के लोगो पर अपना संप्रभुता स्थापित करना।

पौरहाट राजा घनश्याम सिंह की पहली इच्छा को छोड़ कर बाकी दो इच्छाओं की पूर्ती अंग्रेजों ने कर दी।

हो देशम/ कोल्हान 

➥ हो देशम ‘लडाका कोल’ के नाम से प्रसिद्ध थे। इन पर कभी भी कोई बाहरियों का नियंत्रण नहीं था।

इनको अपने अधीन लाने के लिए वर्ष 1820 में मेजर रफसेज सेना के साथ हो देशम हुआ। 

चाईबासा के निकट रोरो नदी के तट पर हो लोगों से हुई लड़ाई में अंग्रेज विजयी हुए और उत्तरी भाग के हो लोगों को पोरहाट के राजा को कर देने के लिए विवश किया गया। 

परन्तु स्वतंत्रता प्रिय हो देशम/कोल्हान के हो लोगों ने पोरहट राजा को कर देने से मन कर दिया और एक बार फिर विरोध शुरू हो गया। 

हो लोगों ने सीमावर्ती राज्यों के इलाकों में उपद्रव मचाना शुरू कर दिया।

परिणामस्वरूप 1821 ई. में कर्नल रिचर्ड के नेतृत्व में एक बड़ी सेना हो विद्रोह को दबाने के लिए भेजी गई। 

हो लोगों ने रिचर्ड का सामना किया किन्तु अंततः संधि करना बेहतर समझा।

➤ संधि की शर्त थीं –

1. कंपनी की अधीनता स्वीकार कर उसके प्रति वफादार बने रहना,

2. अपने राजाओं-जमींदारों को पाँच वर्षों तक कर देना स्वीकार किया,

3. कोल्हान के मार्ग को यात्रियों के लिए खुला एवं सुरक्षित रखना ,

4. सभी जाती के लोगों को अपने गाँवों में बसने की अनुमति तथा 

5.अपने बच्चों को हिन्दी व उडिया को पढ़ने के लिए प्रोत्साहित करना।

6. उत्पीड़ित किये जाने पर हथियार उठाने के बजाय कंपनी सरकार से फरियाद करना।

इस संधि के बावजूद हो लोग पोरहाट के अधीन रहने को तैयार नहीं थे।

➤ 1831-32 ई. में ही लोगों ने फिर विद्रोह किया । 

दक्षिण-पश्चिमी सीमांत एजेन्सी (South-Western Frontier Agency) के गवर्नर जनरल मेजर विलकिन्सन और कर्नल रिचार्ड के नेतृत्व में अंग्रेज सेना कोल्हान में प्रविष्ट हई।

1837 ई. में हो लोगों ने आत्म-समर्पण किया और पोरहाट के सिंह राजा के बजाय सीधे कम्पनी को कर देने हेतु सहमत हुए।

कोलों के अलग अंचल ‘कोल्हान’ नाम से एक नई प्रशासकीय इकाई का गठन किया गया जिसका सदर (HQ) चाईबासा को बनाया गया।

 Singhbhum: देशी रियासतें

सरायकेला 

सरायकेला रियासत की स्थापना विक्रम सिंह (पोरहाट के राजा अर्जुन के पुत्र) ने की। वर्ष 1770 में सरायकेला का सम्पर्क अंग्रेजों से हुआ।

1803 के Anglo-Maratha War के समय गवर्नर जनरल ने सरायकेला के राजा अभिराम सिंह को मराठों के विरुद्ध सहायता करने को कहा बदले में उससे कर नहीं लिए जाने की पेशकश की गयी।

1820 ई. में सरायकेला नरेश की सहायता से तमाड़ का विद्रोही नेता रूदन को पकड़ा जा सका।

फिर 1857 की क्रांति में सहयोग देने के कारण अंग्रेजों ने पोरहाट राज्य का एक हिस्सा “कारयकेला” सरायकेला नरेश को भेंट में दिया। 

सरायकेला के अंतिम राजा आदित्य प्रताप सिंह देव हुए।

आज़ादी के बाद वर्ष 1947 ई. में इसे भारतीय संघ में शामिल कर लिया गया और,
1956 ई. में राज्यों के पुनर्गठन के समय इसे बिहार राज्य में मिला दिया गया।

 खरसावाँ

खरसावाँ रियासत की स्थापना सरायकेला रियासत के संस्थापक विक्रम सिंह के दूसरे पुत्र ने की।

वर्ष 1793 ई. में पहली बार खरसावाँ रियासत का अंग्रेजों के साथ संबंध स्थापित हुआ।

वर्ष 1947 ई. में इसे भी भारतीय संघ में शामिल कर लिया गया। 1956 ई. में राज्यों के पुनर्गठन य इसे बिहार राज्य में मिला दिया गया।

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Dear AspirantsJharkhand GS की इस series में हमने Singh Dynasty of Singhbhoom – सिंघभूम का सिंह राजवंश के बारे में discuss किया।

यह आर्टिकल आपको Jharkhand में होने वाले सभी Sarkari Naukri Exams में आपकी मद्दद करेगा।

Singhbhum: Top 20 facts about Singh dynasty

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